कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं !
गीत की एक पंक्ति मेरी अपनी नहीं बल्कि प्रेरणा स्वरुप ली गई है आप सभी इस पंक्ति को पहचानते हैं लेकिन इस पंक्ति का कोई स्थानापन्न मेरे गीत के साथ इन्साफ नहीं कर सकता था इसलिए पंक्ति के साथ बिना कोई छेड-छाड किये मेरा ये गीत पेश-ए-नज़र है | गौर फरमायें (गलतियों को नज़रंदाज़ करें सिर्फ इसलिए कि हर एक पंक्ति मेरे दिल के बहुत करीब है)-
छोड़ कर हम चले क्यूँ अधूरा सफर,
कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं;
दिल की आवाज़ को अपने अहसास को,
हम दबाते रहे हम छुपाते रहे;
ठेस लग जाए ना उनके अहसास को,
हम अकेले ही आँसू बहाते रहे ;
जिस्म जिन्दा रहा और हम मर गए,
कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं |
भूलकर सारी दुनिया के जुल्मों-सितम,
उसकी आगोश में सो गए बेखबर;
रस्मों-चाहत वफ़ा सब फ़ना हों गई,
चाक उसने किया मेरा जिस्मो-जिगर;
कितना मासूम था वो मेहरबां मगर,
कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं |
सारे इलज़ाम सर अपने आयत किये,
ओढ़ कर हम चले बस वफ़ा का कफ़न;
ढो काँधों पे अपना जनाज़ा ‘गज़ल’,
उसकी खातिर किया खुद को जिंदा दफ़न;
रूह पर ज़ख्म कितने थे बेजा मगर,
कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं |
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