Friday, October 15, 2010

एक विवाह ऐसा भी

प्रस्तावना :


बात शायद १९८४-८५ की है, तब मैं ७-८ वर्ष का था | उस वक्त पापा की कलेक्शन में एक कैसेट थी जिसे मैं अक्सर सुनता था क्योंकि इसमें एक छंदबद्ध व्यंग था | आज के परिवेश में वह सत्य साबित हों रही है | स्मृति के आधार पर प्रस्तुत कर रहा हूँ | त्रुटियाँ संभव हैं पर आशा है आप उसे सहर्ष स्वीकार कर लेंगे | भाव लीजिए ना !

गुजारिश:

पूरा मजा लेने के लिए उच्चारण करके पढ़ें | मन में पढ़ने पर कम मजा आने की सम्भावना है !

अवसर :

शुभ-विवाह, माडर्न ईस्टाइल में |
आजकल की गहमा-गहमी और भागम-भाग वाली जिंदगी में जब सब कुछ फास्ट फ़ूड की तरह ही लोगों को भाता है, एक शादी का मंडप सजा दिया गया | मेहमान (वर-पक्ष), मेज़बान (कन्या-पक्ष), दर्शक(गली-मोहल्ले वाले), दूल्हा-दुल्हन, पंडित जी और कंमेंटरी करने के लिए हमारे कवि महोदय ने अपना-अपना मोर्चा संभाल लिया | विवाह की रस्में शुरू की गयीं-
एक स्टूल पर दायें पंडित, एक स्टूल पर बाएं पंडित,
एक कुर्सी पर वर विराजे, एक पर कन्या आरूढ़ है,
यज्ञ कुण्ड प्रतिस्थापित करके, बीच में स्टोव रखा है |

ओम सूर्याय स्वाहा (दूल्हे ने पम्प मारा),
ओम चन्द्राय स्वाहा (दुल्हन ने पम्प मारा),
ओम नवग्रहाय स्वाहा (दूल्हे ने पम्प मारा),
ओम नमः शिवाय स्वाहा (
(दुल्हन ने पम्प मारा),……………..
पम्प-पम्प की आहुति लेकर हवन तेज हो गया स्टोव पर,
पंडित ने दुलहिन का दुपट्टा, दुलहे के टाई से बाँधा,
अब फेरे पड़ने वाले हैं |
मन्त्रों का उच्चारण करके पंडित ने दूल्हा-दुल्हन की गोल-गोल कुर्सियां घुमा दीं |
चक्कर खा कर सात रुकी दुल्हन की कुर्सी,
पर दूल्हे की कुर्सी, फिरकी सी घूम रही थी,
पंडित ने कुर्सी को रोका,
दुलहिन ने पंडित को टोका |
पंडित बोला- हे पुत्री, जो ज्यादा कुर्सी घूम गई तो वर आवारा हो जायेगा |

(हमारे यहाँ शादियों में दुल्हन दूल्हे के दायें ओर बैठती है, विवाह की रस्मो के दौरान वर और कन्या एक दूसरे से क्रमशः ७ और ५ वचन भरवाते हैं तत्पश्चात कन्या वर के वाम अंग स्थान लेती है और उसे वर पर विधिवत अर्धांगिनी होने का अधिकार प्राप्त होता है | कन्या और वर का तो सिर्फ नाम होता है, पंडितजी लोग स्वयं ही वचन बोलते हैं और वर और कन्या से हामी भरवा लेते हैं | लेकिन हमारे पढ़े लिखे इन वर-वधू को ये भला कैसे स्वीकार होता | तो आइये देखते हैं ये वचन कैसे लेते हैं |)
‘मेरे कुल और माता-पिता को क्या तुम अब अपना समझोगी ?’ पंडित ने कन्या से पूछा |
उछल पड़ा दूल्हा कुर्सी पर- ‘रे पंडित, दुल्हन तेरी है या मेरी ? ये सवाल मैं खुद पूंछुगा |
दूल्हा बोला-
हे सुमुखी, हे प्राण-पियारी,
मैं तेरी सारी शर्तों को एक-एक कर स्वीकारूंगा |

दुल्हन (पहली शर्त)-
हे प्रियतम ये शर्त है पहली, आठ बजे तक मैं सोती हूँ,
आठ बजे से पहले, यदि तू मुझको नहीं जगाए |
तो मैं तेरे वाम अंग आ जाऊं |

दूल्हा-
प्राण-पियारी मेरे घर में,
आठ बजे से पहले सूरज नहीं निकलता,
मेरे वाम अंग आ जाओ |

दुल्हन (दूसरी शर्त)-
तेरे माता-पिता अगर मेरी गतिविधयों में,
कोई दखल नहीं रखें तो मैं तेरे वाम अंग आ जाऊं |

दूल्हा-
मैं अपने मम्मी-पापा को अलमारी में बंद कर दूँगा,
मेरे वाम अंग आ जाओ |

दुल्हिन (तीसरी शर्त)-
तू हर माह मुझे जो एक नई फिलम दिखलाये,
तो मैं वाम अंग आ जाऊं |

दूल्हा-
मेरे मामा निर्माता हैं,
अगले माह ‘बम्बई’ जा कर,
मैं तुझको ही फिल्मा दूँग,
मेरे वाम अंग आ जाओ |
दुल्हिन (चौथी शर्त)-
मुझको जो तू हर गर्मी में हिल-स्टेशन की सैर कराये,
तो मैं वाम अंग आ जाऊ |

दूल्हा-
तेरे लिए आँगन में ही एक पहाड़ बनवा दूँगा,
जब जी चाहे तब चढ़ जाना,
मेरे वाम अंग आ जाओ |
दुल्हन (पांचवी शर्त)-
तू मेरे कुत्ते टामी को अगर कभी ना दुत्कारे,
तो मैं वाम अंग आ जाऊं |

दूल्हा-
तेरे कुत्ते को मैं अपना पुत्र समझ कर ही पालूँगा |
मेरे वाम अंग आ जाओ |

दुल्हन (छठी शर्त) -
तू सच्चे दिल से जो मुझको पूरा-पूरा प्यार करे तो,
तो मैंन वाम अंग आ जाऊं|

दूल्हा -
प्राण-पियारी तन से-मन से,
मैं अपने पूरे वेतन से,
तुझको पूरा प्यार करूँगा,
मेरे वाम अंग आ जाओ |
दुल्हन (सातवीं शर्त)-
हे प्रियतम तू मुझे छोड़ कर,
सभी नारियों को जो अपनी माँ समझे,
तो तेरे वाम अंग आ जाऊं |

दूल्हा -
शर्त मुझे स्वीकार नहीं ये, मैं इसको ना स्वीकारूंगा,
जिनको अब तक पत्नी समझा उनको कैसे माँ समझूंगा ?
तू मेरे दाएँ अंग ही रह !

कूद पड़ा दूल्हा वेदी से,
टूट गए सारे गठबंधन,
बिखर गए सब फूल हार के,
यज्ञ कर रहा करुणा क्रंदन,
कलियुग की सीता मंडप में,
छोड़ गया उसका रघुनन्दन ||

ओम शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||

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