Friday, October 15, 2010

मैंने जीना चाहा था !

सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था,

चाक कलेजे के ज़ख्मों को मैंने सीना चाहा था;

जो भी आया उसने ही कुछ दुखते छाले फोड़ दिए,

वहशत की आग बुझाने को मेरे सब सपने तोड़ दिए;

तेरे आँचल के धागों से रिसना ढकना चाहा था,

सुर्ख इबारत बयाँ करेगी- मैंने जीना चाहा था |

अपनी ही रुसवाई पर, हम तो हँसते रहे सदा,

गम को गले लगा के रोये, खुशियाँ करते रहे विदा;

गम बाजारू हों ना जाएँ, आँसू पीना चाहा था,

सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था |

तुझको देखा, तुझको चाहा, मैंने तुझको जाना था,

दो पल जी लूँ तेरा बनकर, और तो ना कुछ पाना था;

कुछ सूखे ज़ख्मों का मैंने दर्द भुलाना चाहा था,

सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था |

तेरे होठों की जुम्बिश को मैंने माथे पर रखा,

तेरी कही-अनकही बातों को पल-पल पहचाना था;

मैं ना तुझसे दगा करूँगा, यकीं दिलाना चाहा था,

सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था |

बस तेरे इक पल की खातिर मैंने दर्द हज़ार जिए,

प्यास बुझाने की खातिर अपने आँसू दिन रात पिए;

ना कोई दरकार और थी, ना कुछ लेना चाहा था,

सुर्ख इबारत बयान करेगी – मैंने जीना चाहा था |

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