Friday, October 15, 2010

अहसास

दर्द सारे तेरी रहमत समझ के सह लूँगा,
कोई भी दे-दे सजा मुझको, जिंदगी के सिवा !

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जिसे रब अपना माना है, जिसे दिल में जगह दी है,
वो संगदिल दर्द देने के सभी सामान रखता है |

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तू ज़हीन है तेरा कोई गुनाह नहीं,
अपने सवालों का मैं खुद को जवाब क्या दूं ?

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बेरहम शिलाओं बतलाओ, मेरा ईश्वर खो गया कहाँ,
जो मुझ पर जान छिडकता था, वो मुझे छोड़ कर गया कहाँ ?

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कैसे, कहाँ और और कब ये बात होगी, क्या जाने,
लेकिन यही होगा के तुम्हें लौटना होगा |

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हो जायेंगे फ़ना हम इक पल की बेरुखी से,
तुझको भी ये पता है, मुझको भी ये पता है |

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जो कभी जिस्म के घेरे से ना निकल पाया,
वो मेरी रूह को छूता भी तो कैसे छूता !

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हम जुदा हो के बेवफा ना हुए,
वो साथ रह के बावफा ना हुए |

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हमको गम के अंधेरों में भटकता छोड़ गया,
जिसकी राहों में किया खुद का चिरागां हमने !

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मैं अपनी तंगहाली का बयाँ कैसे भला करता,
तू अपनी तंगदिली का हाल ही कहती रही मुझसे |

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नहीं गम है के तू कमज़र्फ है और मुझसे है गाफिल,
शिकायत सिर्फ इतनी है – वफ़ा की ये सजा कैसी ?

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