पाप
नहीं रोया खुदा के जुल्म से न भूख से रोया,
किसी भी हाल में उसने कभी साहस नहीं खोया,
न उसने प्यार माँगा न कभी नफरत किसी से की,
ज़माने के सितम की भी शिकायत तो न उसने की,
रहा खामोश उसने दर्द अपना खुद पिया हर पल,
जिया के आज है कुहरा घना पर ये न होगा कल,
नहीं होता यकीं पर सच है- मैं उससे कल मिला था,
ये उसकी ही गुनहगारी का कुछ शायद सिला था,
कलेजा अपना रखकर गोद में खुद सी रहा था,
भरे थे आँख में आँसू वो सिसकी पी रहा था,
नहीं कुछ कर सका चुपचाप मैं लौटा वहाँ से,
दुआ की ए खुदा उसको उठा ले इस जहाँ से,
सितम जो तूने ढाए और जहाँ ने जो दिए हैं,
तेरे मासूम बंदे ने वो सारे जी लिए हैं |
बेहतरीन पोस्ट .आभार !
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