Friday, October 15, 2010

आँख का पानी

इंसानों की दुनिया में एक इंसान न मिला,
पत्थर के बीच कोई भगवान् न मिला;
सदियाँ गुज़र गई है बे-रूह भटकते,
इस जिस्म को अभी कोई फरमान न मिला.

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अधूरा सा जीवन, अधूरे से सपने,
यहाँ सिर्फ खाली निगाहें मिलेंगी;
ना इनमे तलाशो कोई ख्वाब अपना,
जहर से बुझी चंद यादें मिलेंगी |

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बेसाख्ता बरसात से डूबी थी ये दुनिया,
धरती ने पायीं सूखने के बाद फिर खुशियाँ;
‘चातक की कहानी में भी बरसात तो आई,
उसकी  तो बस इक बूँद भी, नाले निगल गए |

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मैं चाँद जानूँ ना सितारों को,
ना रवायत को ना रिवाजों को;
तुम ना समझे ना हम बता पाए,
मीन और नीर के अहसासों को |

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पूजती है जिसको दुनिया उसको भी पूजा नहीं,
सबको जो एक जैसा समझे, वो खुदा मेरा नहीं;
जिसकी नजरों में हूँ मैं, पतवार भी देखे ना जो,
देखता है जो समंदर, नाखुदा मेरा नहीं |

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तू मेरे जिस्म में बहता है, लहू की तरह,
तू मेरी साँसों में पलता है, खुशबू की तरह;
बेवफा इस जहाँ का बस इक खुदा है तू,
तू यकीं है मेरा दुआओं में जादू की तरह |

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रूह छलनी रही और जिस्म तार-तार रहा,
आखिरी साँस तलक उसका इंतज़ार रहा !
जुबान पे रंज था जब उसकी बेवफाई का-
खुदाया दिल को तब भी उसका ऐतबार रहा !

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मैं मातम रोज करता हूँ, मगर आँसू नहीं बहते,
ये किस्से बेवफाई के सरे महफ़िल नहीं कहते;
जनाज़े दो उठाए अपने काँधे पर मैं फिरता हूँ,
मरा मेरी आँख का आँसू, तेरी आँखों का पानी है |

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लता सी लिपट के वो जिस्म में विष घोलती रही,
वफ़ा की आड़ में वो सब्र मेरा तोलती रही;
मैं था नादान यकीं कर लिया उसकी मोहब्बत का,
वो तो कमज़र्फ थी जज़्बात से बस खेलती रही |

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गुनाह हो गया दुनिया में क्यूँ चला आया,
न कोई साथी तेरा है, न कोई हमसाया,
कल तो सोया था ‘कृष्ण’ मौत कि हसरत लेकर,
ये क्या हुआ के आज फिर क्यूँ सवेरा आया?

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फक़त चेहरा छुपाने से, छुपेगी न गुनहगारी,
सवालों का मेरे तुझको तो करना सामना होगा,
मैं चुप रह जाऊँगा, फिर भी ये तारीखें पुकारेंगी,
जहाँ के कोने-कोने से मेरी आवाज़ आएगी !

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हर दुआ लौटी है फलक से बेअसर तो क्या ?
आज वो हमनशीं हमसे है बेखबर तो क्या ?
किसी के नाम का कलमा पढ़ा काफ़िर मैं हुआ,
आज रब ने रखा नेज़े पे मेरा सर तो क्या ?

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कहानी अपने अश्कों की ज़ुबानी क्या बयां करते,
हम अपने ज़ख्मो की बेजा निशानी क्या बयां करते;
न थी आवाज़ अश्कों में न थी फरियाद ज़ख्मो में,
बरसते शोलों में सावन का पानी क्या बयां करते.

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मैं व दीपक हूँ जो बुझ जायेगा अपनी रवानी में
मैं वो सूरज हूँ जो ढल जायेगा चढ़ती जवानी में
मैं जब खो जाऊंगा तुमसे जुदा हो कर फजाओं में
कभी ढूंढोगे प्यासों में कभी सावन के पानी में

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