अजान के अब्बा
वैधानिक चेतावनी - इस लेख का किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है फिर भी किसी प्रकार की समानता महज एक संयोग माना जाएगा | जो थोड़ा पढकर ज्यादा समझने वाले पाठक हों उनका खास स्वागत है कि इस बड़े से लेख की छोटी-छोटी बातें समझकर अवगत कराएं | तीन दोस्त - ‘अजान’, ‘समझदार’ और मैं(’चातक’) लंगोटिया यार थे | साथ-साथ रहना खेलना-कूदना और पढ़ना यही हमारी दिनचर्या थी | यूँ कहें की साथ-साथ पले बढे और कालेज जाने लगे |
प्रथम परिचय- जब तक बच्चे थे तब तक तो बस स्कूल में याराना निभाना था लेकिन बड़े होने के साथ-साथ ये दोस्ती क्लास और खेल के मैदान से निकल कर वैचारिक आदान प्रदान तक पहुँची और एक दूसरे के घर भी आना जाना होने लगा तो एक दूसरे के घर वालों (माता-पिता , भाई-बहन , और नाते-रिश्तेदारों ) से भी संपर्क में आये | अब हमें एक दूसरे की संस्कृतियों को परखने और उन्हें जानने का भी मौका मिला | अब हम ये भी जान चुके थे कि मैं और समझदार हिंदू थे और अजान मुसलमान |
भेद भाव - हम जब अजान के घर जाते तो उसके घर पर कोई भेद-भाव नहीं होता था जिस प्याली में अजान की चाय आती उसी में मेरी और समझदार की | जिस प्लेट में अजान का नाश्ता होता उसी में हमारा भी | जब हम तीनो मेरे घर में होते तब मुझे भेद-भाव साफ़-साफ़ दिखाई देता | अजान की मौजूदगी जानते ही बर्तन दूसरी अलमारी से निकलने लगते | हालाकि इस बात का अंदाजा अज़ान को नहीं चलने दिया जाता था लेकिन मुझे तो इस बात की जानकारी होती ही थी अतः बुरा लगना स्वाभाविक था | एक दिन मैंने अम्मा से कारण पूछा तो उन्होंने बड़े धैर्य से बताया की अजान मुसलमान है वो अंडे और माँस जैसी चीज़ें खाता है जिसे हम छूते भी नहीं उसका धर्म और उसकी विशेषताएं अलग हैं जबकि हमारी अलग | पर अम्मा अजान की अम्मी तो ऐसा नहीं करती मैंने पूछा | हाँ बेटा क्योंकि उनके रीति रिवाज़ और मान्यताएं यहाँ तक कि खान पान और आपसी सम्बन्ध हमसे बिलकुल अलग हैं | तो क्या वे हिन्दुस्तानी नहीं मैंने क्रोध में पूछा | अम्मा हंस पड़ी वो तुझसे ज्यादा हिन्दुस्तानी है कभी यहाँ लखनऊ में मुसलमान बादशाहों की ही हुकूमत हुआ करती थी और हम उनकी रियाया थे, लेकिन तब भी हम अपनी संस्कृति और धर्म का पालन करते थे और वे अपनी | बात अब थोड़ी समझ में आने लगी | धर्म पर एक गंभीर बात का ये पहला वाकया था | समझदार के घर का माहौल भी मुझे कुछ अपने घरजैसा ही लगा | मैंने गौर किया कि समझदार की माँ मेरे पहुँचने पर राखी बहन के साथ मुझे शतरंज में फँसा के अक्सर अपना काम निपटाने के लिए किचन में चली जाती थीं लेकिन जब अजान मेरे साथ हो तो उनकी कोशिश यही होती थी कि शतरंज की बिसात बिछने ना पाए और अगर कभी हम खेलने भी लगें तो वो राखी को किसी ना किसी बहाने वहाँ से हटा देती |लेकिन इस मामले में भी अजान के घर का दृश्य अलग था अजान भी समझदार की तरह अपने घर का बड़ा लड़का था और उसी की चलती थी हालाकि अजान के अब्बा को सलमा और शादमा का मेरे और समझदार के साथ उठना बैठना या घुलमिल के बात करना पसंद नहीं था लेकिन अजान के सामने वो कुछ नहीं बोलते थे | मैंने ये बात अपनी माँ से भी बताई | माँ ने कहा ‘देख अजान तेरा दोस्त है इसलिए गीता और राखी की ही तरह सलमा और शादमा भी तेरी बहने हैं | फिर तेरा सम्बन्ध अजान से है वहीँ तक रख किसी के घर की बहन-बेटियों से तेरा क्या लेना देना और तेरे दोस्तों का भी वास्ता तुझ तक होना चाहिए घर की महिलाओं से कैसी दोस्ती रे ?” मेरे दिल में दबे मानो सभी सवालों का जवाब मुझे मिल गया कि पडोसी से सम्बन्ध उतने ही मजबूत होंगे जितनी मजबूत दोनों के बीच की दीवार |
अजान के अब्बा- संयोगवश एक दिन भारत और पाकिस्तान का क्रिकेट मैच चल रहा था और हम तीनो दोस्त अजान के घर पे ही मैच देखने बैठ गए | मैच दिलचस्प था लेकिन एक बात बार-बार काट रही थी | इण्डिया का विकेट गिरने पर अजान के अब्बा की बांछे खिल उठती थीं जबकि बाउंड्री पड़ते ही लगता था मानो किसी सगे वाले का जनाज़ा उठ गया हो | थोड़ी देर तक तो मैं बर्दाश्त करता रहा फिर मैं बोल पड़ा “चचा, आप कैसे हिन्दुस्तानी हैं जब इण्डिया का विकेट गिरता है तब खुश होते हैं ?” चचा बड़े हाज़िर जवाब (उनका ये रूप और शायद उन्होंने भी मेरा ये रूप पहली और आखिरी बार देखा)- बेटा ये तो खेल है कोई भी टीम आपकी पसंदीदा टीम हो सकती है | मेरी टीम पकिस्तान है | सुनते ही मेरा पारा १०५ डिग्री से ऊपर बताने लगा (मेरा बड़ा भाई वहाँ इन नापाक पाकिस्तानियों की बंदूकों के सामने अपनी छाती खोले बैठा है और ये यहाँ हमारी छाती पे मूंग दलेंगे ) | ए समझदार उठ चल यहाँ से यहाँ तो जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो वाले लोगों की जमात बैठी है भाड़ में जाए पाकिस्तान और भाड़ में जाए ये ईमान के आधे चचा | इन्ही जैसे लोगों की वजह से मुसलमानों की वतन परस्ती पर दाग लगता है मेरे भैया के साथ राशिद भाई भी सीमा पर तैनात हैं उनके घर में ऐसी बात करने की मजाल नहीं किसी की चल यहाँ से ! एक आश्चर्य से उबर भी ना पाया था कि दूसरा फिर सामने | देख चातक तू नाहक ही भडकता है जोश में तू होश खो बैठता है ऐसे तो ‘गाड़ी उद्देश्य हीन होकर ठुक जाती है जर सी बात हुई नहीं की कूदने लगता है |’ आ बैठ चचा को ठन्डे दिमाग से समझाते हैं | भाड़ में जाए ठंडा दिमाग तू समझा लेकिन मैं बताये देता हूँ ‘बूढा तोता कभी नहीं सीखता | उम्र बीती है फाका मस्ती में अब इस उम्र में क्या खाक मुसलमां होंगे !’ इतना कह के मैं चला आया |
नई शुरुवात- बचपन की दोस्ती भला मानती कहाँ है अगले ही दिन अजान और समझदार ने फिर घेर लिया अजान तो कुछ नहीं बोला लेकिन समझदार ने बताया कि अजान अपने अब्बा से कतई इत्तेफाक नहीं रखता है | उसकी निष्ठा हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानी टीम के साथ ही थी | बात को बढाने से कुछ मिलने वाला नहीं था मैंने भी ऊपर से दलील मान ली | दिल अभी भी कह रहा था जब पिता के मन में इतनी कुंठा है तो क्या उसने अपने बच्चों को इससे अछूता रखा होगा ? खैर, हम फिर से दोस्त थे पर कहीं हल्की सी फांस तो चुभ रही थी | मेरा आना जाना अब अजान के घर ना के बराबर था कभी गया भी तो दरवाजे से ही लौट आया | ‘जिस घर में दुश्मन देश के चाहने वाले हों उसका पानी भी हराम है|’ समझदार और अजान की दोस्ती में कोई फर्क नहीं आया था बल्कि अब तो समझदार अजान के अब्बा जान के और करीब हो गया कारण स्पष्ट था के एक बिगडैल हिंदू लड़के से ये शांत हिंदू लड़का कहीं जयादा सभ्य था |
समझदार की समझदारी- समझदार अब अक्सर हिंदू-मुस्लिम संबंधों की चर्चा किया करता और तरह-तरह की तरकीबें निकाला करता की दोनों के बीच मधुर सम्बन्ध कैसे बन सकते है | उसने हमारे कालेज में होने वाली भाषण प्रतियोगिता में भी हिस्सा लिया और पाकिस्तान से मधुर सम्बन्ध कैसे बनाए जा सकते हैं तथा हिंदू मुस्लिम एकता पर तमाम सारे नुस्खों की जोरदार वकालत के साथ पहला इनाम पाया | अब तो वो इस विषय का आधिकारिक गुरु भी बन गया |
अजान बनाम समझदार- एक दिन अचानक सारा नज़ारा ही बदल गया | अजान को उसके मोहल्ले के कुछ लड़कों के बताया कि उसकी गैर-मौजूदगी में समझदार का उसके घर काफी आना जाना रहता है तरह-तरह की चर्चाएं होनी शुरू हो गई हैं | अजान भाई अपनी बिरादरी में लड़कों की कमी है क्या ? अजान के तो काटो तो खून नहीं | अब उसने धीरे-धीरे समझदार से कन्नी काटनी शुरू कर दी | समझदार काफी दिनों बाद फिर मेरे पास पहुंचा | आखिर दोस्त था मैं उसका ! ‘यार कुछ कर मैं सलमा से बहुत प्यार करता हूँ | पता नहीं किसने जा कर सेंक दिया अजान अब घास ही नहीं डालता घर पर जाओ तो दरवाजे से ही रुखसत कर देता है | तू तो मेरा यार है, कुछ कर भाई !’ समझदार ने मिन्नत की | मैं ठहरा उल्टी बुद्धि का कब की बात कब उठा के पटक मारी | ‘अच्छा बेटा तो तुम अजान के घर बैठ के हिंदू-मुसलमान के बीच यही मधुर सम्बन्ध बना रहे थे ? वही मैं कहूँ कि तेरे अंदर इतनी समझदारी कहाँ से आ गई कि अपने मुल्क का विरोध करने वाले से तेरी दोस्ती में तनिक भी दरार क्यों ना पड़ी | सुरा और सुंदरी कितनी दलीलें पैदा कर देती हैं इसका अंदाजा अब हो रहा है मुझे | नज़रें जब किसी की बहन या बेटी पर हों तो जुबां से मधु तो टपकेगा ही ! नहीं तो ‘गाड़ी उद्देश्य हीन होकर ठुक जाती है ना ?’ अब समझ में आया कि तू कौन सी गाड़ी लाइन पे ला रहा था | देख दोस्त जब अपनी नीयत दुरुस्त हो तब सारे फलसफे जायज़ भी होते हैं और अच्छे भी | तेरे आँखों के आगे इस समय वासना की पट्टी चढ़ी है | तुझे मेरी बात समझ में नहीं आएगी फिर भी सुन मित्र, पराये पंथ और धर्म, गुरु और अपने कुल की स्त्रियां त्याज्य होती हैं | तुझे शायद समझ में ना आये क्योंकि इसके लिए संयम की जरूरत होती है जो तेरे जैसे प्रेमियों और सलमा जैसी प्रेमिकाओं के पास नहीं होती | विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, पंथों और परिवारों के बीच प्यार और विश्वास बनाये रखने का यही एक मंत्र है | समझ में आये तो समझ वरना निकल तो ले यहाँ से और जा अजान के अब्बा को प्यार की बातें सिखा समझदारी से लेकिन बचके कहीं अजान के हत्थे ना चढ़ जइयो | और देख सलमा को लेके कल्टी होने की तो सोचना भी मत वरना जो प्यार तू फैलाने की बात कर रहा है उसकी आग का नाम साम्प्रदायिक दंगा होता है मेरे मिटटी के बर्तन ! मेरी कितनी बात उसके पल्ले पड़ी नहीं मालूम लेकिन वो झल्ला के परली ओर चल चुका था |
No comments:
Post a Comment