भूमिका
बचपन में शायद सन् ५५ में हम सभी भाई बहन कभी दादी, कभी नानी, कभी अम्मा तो कभी मौसियों से हर शाम कहानियां सुना करते थे | ये एक अच्छी कहानी सुनते-सुनते सपनों में खो जाने का बढियाँ तरीका था | कितनी ही कहानियां भूल-बिसर गईं लेकिन जब भी कोई समस्या, कोई घटना सामने आती है तो अचानक ही वे कहानियाँ मानो पथ-प्रदर्शक बन राह दिखाने लगती हैं | यहाँ मैं उन सात कहानियों को यथा संभव उन्हीं शब्दों और उसी अंदाज़ में बयाँ करने की कोशिश कर रहा हूँ जैसी मैंने सुनी थीं| इनमे छिपे रहस्यों को मैं साथी लेखकों और पाठकों पर छोड़ देता हूँ, खुद समझें और हो सके तो मुझे भी समझाएँ |अनुरोध एवं चेतावनी
कहानी कृपया रात में ही पढ़ें और सुने वर्ना आपके मामा घर का रास्ता भूल जायेंगे | फिर न कहना कि बताया नहीं था !(१) चिड़िया और चींटी
एक दिन एक छोटी सी चिड़िया एक दाना दाल ले कर अपने घोंसले कि ओर उडती जा रही थी | संयोग से वो दाना उसकी चोंच से गिरा और एक खूंटे की दरार में फँस गया | चिड़िया ने बहुत चोंच मारी लेकिन दाना इतने गहरे चला गया था कि निकल न पाया|चिड़िया उड़ कर बढ़ई के पास पहुँची और उसने कहा-
‘बढ़ई-बढ़ई खूँटा चीर, खूंटवा मा दाल है,
का बनाई ? का खाई ? का लई के परदेस जाई ?
बढ़ई – जा-जा तेरा एक दाना निकालने के लिए मैं खूँटा चीरने ना जाऊँगा |
अब चिड़िया उड़ के राजा के पास शिकायत करने पहुंची -
राजा-राजा बढ़ई डाण (को दंड दे), बढ़ई ना खूँटा चीरे, खूंटवा मा दाल है,
का बनाई ? का खाई ? का लई के परदेस जाई ?
राजा – जा-जा तेरे एक दाने के लिए मैं अपने बढ़ई को दंड नहीं दूँगा |
चिड़िया वहाँ से उड़ के रानी के पास पहुँची, और उसने रानी से अपनी व्यथा कही-
रानी-रानी राजा छोड़, राजवा ना बढ़ई डाणै,
बढ़ई ना खूँटा चीरे, खूंटवा मा दाल है,
का बनाई ? का खाई ? का लई के परदेस जाई ?
रानी- अरी चिड़िया पागल हो गई है क्या ? तेरे एक दाने दाल के लिए मैं अपने राजा को क्यूँ छोड़ दूँ ?
चिड़िया फिर उड़ी | अब वो साँप के पास गई और उससे बोली-
साँप-साँप रानी काट, रनिया ना राजा छोड़े,
राजवा ना बढ़ई डाणै, बढ़ई ना खूँटा चीरे,
खूंटवा मा दाल है,
का बनाई ? का खाई ? का लई के परदेस जाई ?
साँप- जा-जा मैं ना जाता तेरे दाल के दाने के लिए रानी को डसने !
चिड़िया फिर उड़ी | इस बार वो लाठी के पास पहुँची और कहा-
लाठी-लाठी कीड़ा (साँप) मार, कीडवा ना रानी डसै
रनिया ना राजा छोड़े, राजवा ना बढ़ई डाणै,
बढ़ई ना खूँटा चीरे, खूंटवा मा दाल है,
का बनाई ? का खाई ? का लई के परदेस जाई ?
लाठी – मैं तो तेरे लिए साँप मारने ना जाने वाला तू कोई और जतन कर ले |
चिड़िया ने अभी भी हार नहीं मानी | वो आग के पास जा पहुँची और उससे भी यही दोहराया -
आग-आग लाठी जार (जला), लठिया ना कीड़ा मारे,
कीडवा ना रानी डसै, रनिया ना राजा छोड़े,
राजवा ना बढ़ई डाणै, बढ़ई ना खूँटा चीरे,
खूंटवा मा दाल है,
का बनाई ? का खाई ? का लई के परदेस जाई ?
आग- मैं ना जाती तेरे एक दाने के लिए लाठी जलाने !
चिड़िया फिर आगे उड़ चली | रास्ते में उसे नदी मिली, उसने नदी से कहा-
नदी-नदी भाड़ (आग की भट्टी) बुझा, अगिया ना लाठी जारे,
लठिया ना कीड़ा मारे,कीडवा ना रानी डसै,
रनिया ना राजा छोड़े, राजवा ना बढ़ई डाणै,
बढ़ई ना खूँटा चीरे, खूंटवा मा दाल है,
का बनाई ? का खाई ? का लई के परदेस जाई ?
नदी – जा यहाँ से मैं तेरी कोई मदद नहीं कर सकती |
चिड़िया फिर उड़ी अब वो हाथी के पास गई और हाथी से कहा-
हाथी-हाथी नदी सोख, नदिया ना भाड़ बुतावे (बुझाये),
अगिया ना लाठी जारे, लठिया ना कीड़ा मारे,
कीडवा ना रानी डसै, रनिया ना राजा छोड़े,
राजवा ना बढ़ई डाणै, बढ़ई ना खूँटा चीरे,
खूंटवा मा दाल है,
का बनाई ? का खाई ? का लई के परदेस जाई ?
हाथी- मैं ना जाता तेरे लिए नदी सोखने | तू कोई और ढूंढ ले !
इस बार निराश सी होके चिड़िया एक पेड़ कि शाख पे बैठ के रोने लगी | तभी उसे दाल पे कुंलांचे भरती चींटी दिखी | चिड़िया ने चींटी से गुहार लगाई-
चींटी-चींटी हाथी मार, हथिया ना नदी सोखे,
नदिया ना भाड़ बुतावे (बुझाये),
अगिया ना लाठी जारे, लठिया ना कीड़ा मारे,
कीडवा ना रानी डसै, रनिया ना राजा छोड़े,
राजवा ना बढ़ई डाणै, बढ़ई ना खूँटा चीरे,
खूंटवा मा दाल है,
का बनाई ? का खाई ? का लई के परदेस जाई ?
चींटी – अरी चिड़िया तू क्यों रोती है ? मैं हूँ ना ! चल देखूं तो इस हाथी को |
चींटी चिड़िया को ले के हाथी के पास पहुँची और उसने हाथी को चिड़िया की मदद करने को कहा | हाथी ना माना तो चींटी उसके सूंड में घुस गईं | और अंदर काटना शुरू किया | हाथी दर्द के मारे लोटने-बिलबिलाने लगा और चींटी से माफ़ी मांगी-
हमका दर्द दियो ना कोय हम तो नदिया सोखब होय |
चींटी बाहर निकल आई और तीनो चल दिए नदी की ओर | नदी हाथी को देख के घबराई, हाथ जोड़ के नतमस्तक हो गई और कहा-
हमका सोखेव-वोखेव ना कोय, हम तो भाड़ बुताइब होय |
नदी भी साथ हो ली | अब चारों भाड़ के पास पहुँचे | नदी को गर्जना करते आते देख आग सिर झुका के खड़ी हो गई और उसने फ़रियाद की -
हमका बुतायो-वुतायो ना कोय, हम तो लाठी जारब होय |
आग भी साथ हो ली | पांचो लाठी के पास पहुँचे | आग देखते ही लाठी के होश गुम हो गए | घबरा के लाठी बोली -
हम जारेव-बारेव ना कोय, हम तो कीड़ा मारब होय |
लाठी भी साथ चली | अब छहों साँप के पास पहुँचे | लाठी को देखते ही साँप की भी फुस्स हो गई बेचारा मिन्नत करने लगा -
हमका मारेव-वारेव ना कोय, हम तो रानी डसबै होय |
साँप भी साथ हो लिया | सातों पहुँचे रानी के महल में | साँप ने फन फैलाया तो रानी के होश गुम हो गए | रानी गिडगिडाते हुए बोली -
हमका डसे-वसे ना कोय, हम तो राजा छोडब होय |
रानी को साथ ले के सातों दरबार में पहुँचे | जैसे राजा को पता चला की रानी उसे छोड़ के चली जायेगी बेचारे के होश उड़ गए उसने कहा-
हमका छोडेव-वोडेव ना कोय हम तो बढ़ई डाणब होय |
बढ़ई दरबार में बुलाया गया | राजा ने कहा – तुम फ़ौरन चिड़िया का दाना खूंटे से निकाल के दो वर्ना तुम्हे कठोर दंड भुगतना पड़ेगा | बढ़ई ने याचना की-
हमका डाणै-वाणै ना कोय हम तो खूँटा चीरब होय |
बढ़ई ने आरी उठाई और खूँटा चीर दिया चिड़िया ने दाना चोंच में उठाया, चींटी को धन्यवाद दिया और खुशी-खुशी अपने घोंसले की ओर उड़ चली |
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