एक आशिक़ की डायरी से :
(फरवरी १४, २००९)
फितरत और किस्मत दोनों कभी बदलते नहीं !
भूल जाता तो औरों जैसा बन जाता , नहीं भूल सकता इसीलिए न मौत आई न जी पाए ! दिल में घुमड़ता तेजाब था आँखों में वहशत के नज़ारे दिमाग में अपनी चीखों पे उठ रहे गैरों के कहकहे ! शरीफों के बाज़ार में अकेला बेईमान था मैं ! आया नहीं था, लाया गया था ! मेरे साथ पकड़ने छोड़ने का खेल होता रहा और मैं अपने जख्म छिपाए हँसता रहा , मेरे चाहने वाले खुद पत्थरों से बचने को मेरी आड़ लेते रहे ! बस एक कलम थी जो हर वाकया दर्ज करती रही ! दूसरों ने तो उस वहशत के सुबूत पन्नों को जला के सुर्ख-रू होने का ढोंग रचा लिया लेकिन मैं अपने गुनाहों का सुबूत कैसे मिटाता सभी के वादे टूट चुके थे सारे काफ़िर मंदिरों का रुख कर चुके थे नई कसमें खाने के लिए लेकिन मैं तो खुद टूट चुका था जान निकल चुकी थी साँसे चल रही थीं, शरीफों के पत्थर से बचाता भी कौन पहला पत्थर लैला ने ही चलाया, ‘पहले प्यार का पहला गम‘ गाने वाली ‘लैला’ के हाथ में पत्थर थे दिल में नफरत, और होठों पे -
‘इसको फांसी चढा दो ये आशिक रहम खाने के काबिल नहीं है’ |
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