मौन
खामोश निगाहों की फरियाद कौन जाने,
रिसते हुए ज़ख्मों की आवाज़ कौन जाने ?
सुनता है तब खुदा भी जब चीखता है मुल्ला,
मन के स्वरों का वंदन भगवान कौन जाने ?
चुप साध ‘कृष्ण’ बैठा अब देख रहा हलचल,
तूफ़ान ले हिलोरें बीच ताल कौन जाने ?
वो बोलता नहीं पर कुछ चाहता है कहना,
इस मूक इबारत के सुर ताल कौन जाने ?
कहना नहीं है मुश्किल, वो जानता है फिर भी,
वो आप हो रहा है, क्यूँ मौन कौन जाने ?
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