अँधेरा और रौशनी
हवा के परों पे, फिजाँ से गुजरते,
वो मदहोश चंचल परी आ रही है;
मुरादों की ताबीर बनके अँधेरा,
सजाने चली रौशनी आ रही है |
जो बेनूर हमको समझने लगे थे,
उन्हें भी मलाल आज होने लगा है;
वफ़ा की छुअन का जो देखा ये जादू,
के माटी गुलाल आज होने लगा है|
नहीं कुछ शिकायत, न खोने का गम है,
न मन में उदासी न ही आँखें नम हैं;
ये अच्छा हुआ सबने ठुकराया मुझको,
तेरी रहगुजर तक यूँ पहुंचाया मुझको|
जो धुंधली सी परछाई दिखती थी कल तक,
वो बनके हकीकत चली आ रही है;
मुरादों की ताबीर बनकर अँधेरा,
सजाने चली रौशनी आ रही है|
कभी छोड़ करके किनारे लगा था,
वो फिर लौट कर पास आने लगा है;
खुशियों का इज़हार करने की खातिर,
वो बजरे की राहें सजाने लगा है|
जो खोया, बहुत था, मगर आज कम है,
जो पाया, वो गम था, मगर अब करम है;
भले बेवफाई ने भरमाया मुझको,
वफ़ा की किरन तक तो पहुंचाया हमको|
जो मेरी तमन्ना थी, हसरत थी देखो,
वो बनके तबस्सुम चली आ रही है;
मुरादों की तस्वीर बनके अँधेरा,
सजाने चली रौशनी आ रही है|
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