Friday, October 15, 2010

लोकतंत्र या भीड़तंत्र

कैसा है भला ये लोकतंत्र,

चिंतन कर, मंथन कर देखो |



इक्यावन का राज यहाँ,

उनचास के हक़ का मर्दन है |

कौटिल्य का भूले अर्थशास्त्र,

बस कूटनीति का अर्चन है|

निर्माण न करती भीड़ कभी,

तुम भीड़ का हिस्सा बन देखो |



कैसा है भला ये लोकतंत्र,

चिंतन कर मंथन कर देखो |



एक राजतंत्र का कर विनाश,

सौ नव-कुलीन का सृजन है |

जन-जन से शक्ति जुटाकर ही,

जन-जन के मान का मर्दन है |

इस मान-हानि की पीड़ा अब,

तुम आम आदमी बन देखो |



कैसा है भला ये लोकतंत्र,

चिंतन कर मंथन कर देखो |

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